नात लिरिक्स

Kaba Dikha De Maula

काबा दिखा दे मौला

नात ख़्वान: सय्यिद हस्सानुल्लाह हुसैनीशायर: शफ़ीक़ अल्लाह यार परवानउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

का'बा दिखा दे, मौला ! मौला !का'बा दिखा दे, मौला !

'उम्र बची है मेरी कहाँमर ही न जाऊँ, मौला ! यहाँ

का'बा दिखा दे, मौला ! मौला !का'बा दिखा दे, मौला !

कभी गिर्द का'बे के मैं भी तो घूमूँकभी मैं भी का'बे की चादर को चूमूँमुझे भी दिखा दे, ख़ुदाया ! हरम वोबरसती है रहमत की बारिश जहाँ

का'बा दिखा दे, मौला ! मौला !का'बा दिखा दे, मौला !

कभी संग-ए-असवद का बोसा 'अता होकि मरने से पहले ख़तम हर ख़ता होतमन्ना, मेरे रब ! ये पूरी तू कर देइसी जुस्तुजू में हूँ जीता यहाँ

का'बा दिखा दे, मौला ! मौला !का'बा दिखा दे, मौला !

मैं अक्सर ही यादों में का'बे को पहुँचामैं कितना हूँ तड़पा, मैं कितना हूँ रोयाहै बेचैन, मौला ! ये दिल मेरा कितनाकरूँ कैसे मैं ये लबों से बयाँ ?

का'बा दिखा दे, मौला ! मौला !का'बा दिखा दे, मौला !

बहुत हो के आए हैं देखो वहाँ सेकि मैं सिर्फ़ जा ही न पाया यहाँ सेज़ियारत हरम की है कितनों ने कर लीतेरी अब निगाह-ए-करम हो यहाँ

का'बा दिखा दे, मौला ! मौला !का'बा दिखा दे, मौला !

बहुत लोग जाते हैं ऐसे हरम कोकि जैसे हरम हो क़दम दो क़दम कोबड़ा ख़ूब उन का मुक़द्दर है, मौला !ये औक़ात वैसी है मेरी कहाँ

का'बा दिखा दे, मौला ! मौला !का'बा दिखा दे, मौला !

अमीरों ग़रीबों को तू ने बुलायाजिसे तू ने चाहा घर अपना दिखायातुझे वास्ता तेरे प्यारे नबी कामुझे भी किसी दिन बुला ले वहाँ

का'बा दिखा दे, मौला ! मौला !का'बा दिखा दे, मौला !

हरम में खड़े हो के ज़मज़म है पीनाकभी, मेरे मौला ! वो लम्हा है जीनामज़ा और आ जाए, मौला ! वहीं परनिकल जाए उस लम्हे मेरी ये जाँ

का'बा दिखा दे, मौला ! मौला !का'बा दिखा दे, मौला !

मेरी 'आजिज़ाना दु'आ है ये, मौला !मैं हर साल आऊँ तेरे दर पे, मौला !मेरे अहल-ए-ख़ाना भी हों साथ मेरेयूँही आते-जाते रहें हम वहाँ

का'बा दिखा दे, मौला ! मौला !का'बा दिखा दे, मौला !

पकड़ कर ग़िलाफ़ और रो रो के कहनागुनाहगार हूँ तू मुझे बख़्श देनाये मौक़ा' हरम में मुझे भी 'अता होये हसरत हो पूरी, ऐ रब्ब-ए-जहाँ !

का'बा दिखा दे, मौला ! मौला !का'बा दिखा दे, मौला !

मैं पहुँचूँ हरम में जो इस दिल को ले करकहीं धड़कने रुक न जाएँ वहीं परमैं सज्दे में गिर जाऊँ, मौला ! उसी दमकरूँ शुक्र, तू ने बुलाया यहाँ

का'बा दिखा दे, मौला ! मौला !का'बा दिखा दे, मौला !

सफ़ा और मरवा के चक्कर लगाऊँकभी मैं चलूँ और कभी दौड़ जाऊँये सातों ही चक्कर लगाने को बुलवाअदा सुन्नत-ए-हाजरा हो वहाँ

का'बा दिखा दे, मौला ! मौला !का'बा दिखा दे, मौला !

सुना है वहाँ पर कि हज हो रहा हैये परवान सुन कर यहाँ रो रहा हैबुला ले, ख़ुदाया ! इसे भी हरम मेंलगी आग दिल की बुझा दे वहाँ

का'बा दिखा दे, मौला ! मौला !का'बा दिखा दे, मौला !

केवल उपलब्ध श्रेय दिखाए गए हैं; अनुपलब्ध जानकारी का अनुमान नहीं लगाया गया।