उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zara andaz-e-qaza ab ke kaDa lagta hai

ज़रा अंदाज़-ए-क़ज़ा अब के कड़ा लगता है

ذرا انداز قضا اب کے کڑا لگتا ہے

शायर: Maaz Aiz11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़रा अंदाज़-ए-क़ज़ा अब के कड़ा लगता है
वो नया यार मिरा शोख़ बड़ा लगता है

कभी हमदर्द कभी दर्द-फ़ज़ा लगता है
वो सितम-गर है मगर होश-रुबा लगता है

बे-नियाज़ी तो है दस्तूर-ए-हसीनाँ लेकिन
वो हसीं हो के हसीनों से जुदा लगता है

कभी दीदार कराए कभी बातें कर ले
कभी गुफ़्तार से ख़ुद मुझ पे फ़िदा लगता है

कभी पैकान-ए-नज़र से मुझे घायल कर दे
कभी नज़रों से सरापा-ए-हया लगता है

कभी क़ुर्बान लगे तर्ज़-ए-तकल्लुम से वो
कभी मैं बात करूँ तो भी ख़फ़ा लगता है

सबब-ए-ज़ुल्मत-ए-दिल भी हैं उसी की यादें
मिरे दिल का वही ज़ौ-रेज़ दिया लगता है

मैं ने हर बार मोहब्बत में जफ़ा पाई है
मगर इस बार वो पाबंद-ए-वफ़ा लगता है

ये मिरी ख़ाम-ख़याली है हक़ीक़त ये है
वो भी क़ातिल है फ़क़त वार नया लगता है

यही अब राय-ए-ख़िरद है कि भुला दूँ उस को
जो कि अफ़्कार-ओ-तख़य्युल में बसा लगता है

वही अंजाम हुआ जिस से हिरासाँ था दिल
दिल-ए-मजरूह का हर ज़ख़्म खुला लगता है