उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zamane se bichhaDte ja rahe hain

ज़माने से बिछड़ते जा रहे हैं

زمانے سے بچھڑتے جا رہے ہیں

शायर: Kaleem Rahber7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़माने से बिछड़ते जा रहे हैं
हम आपस में जो लड़ते जा रहे हैं

मोहब्बत की बहारें खो गई हैं
चमन दिल के उजड़ते जा रहे हैं

तकब्बुर से ज़मीं पर गिर पड़ेंगे
बुलंदी पर जो चढ़ते जा रहे हैं

तअ'स्सुब की उगी है फ़स्ल जब से
मसाइल और बढ़ते जा रहे हैं

फ़सादों की हवा थमने लगी है
कबूतर ले पकड़ते जा रहे हैं

ख़िज़ाँ का दौर शायद आ गया है
ये बर्ग-ओ-गुल जो झड़ते जा रहे हैं

पुराने पेड़ 'रहबर' आंधियों में
ज़मीनों से उखड़ते जा रहे हैं