उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har samt KHud-numai ka manzar hai aaj-kal

हर सम्त ख़ुद-नुमाई का मंज़र है आज-कल

ہر سمت خود نمائی کا منظر ہے آج کل

शायर: Kaleem Rahber7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर सम्त ख़ुद-नुमाई का मंज़र है आज-कल
रहज़न भी अपने आप में रहबर है आज-कल

झुलसा दिया है जैसे ज़माने की धूप ने
प्यासा है जिस का नाम समुंदर है आज-कल

हर शख़्स चाहता है मिले मर्तबा मुझे
हर एक अंधी सोच का ख़ूगर है आज-कल

इस्मत से खेलना यहाँ जिस का शिआ'र है
सब की निगाह में वही बरतर है आज-कल

ज़रदार जितने शहर में थे उन को घर मिले
घर उस को मिल न पाया जो बे-घर है आज-कल

जो शख़्स अपने दौर का आईना-दार था
अफ़्सोस उस के हाथ में पत्थर है आज-कल

लफ़्ज़ों में किस तरह इसे 'रहबर' बयाँ करूँ
इस दिल के आइने में जो मंज़र है आज-कल