उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye muskuraate tamam sae hue parae to kya karoge

ये मुस्कुराते तमाम साए हुए पराए तो क्या करोगे

یہ مسکراتے تمام سائے ہوئے پرائے تو کیا کرو گے

शायर: Tahir Adeem10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये मुस्कुराते तमाम साए हुए पराए तो क्या करोगे
हवा ने जब भी मिरे बदन के दिए बुझाए तो क्या करोगे

तुम्हारी ख़्वाहिश पे उम्र भर की जुदाइयाँ भी क़ुबूल कर लूँ
मगर बताओ बग़ैर मेरे जो रह न पाए तो क्या करोगे

वो जिन में मेरे अज़ाब तेरे सराब उभरे या ख़्वाब डूबे
वो सारे लम्हे तुम्हारी जानिब पलट के आए तो क्या करोगे

बग़ैर दर के किसी भी घर में घिरे हुए हो ये फ़र्ज़ कर लो
और ऐसे आलम में मिल सके न जो मेरी राय तो क्या करोगे

अभी तो मेरे ग़िलाफ़ हाथों में मुतमइन हैं पे बा'द मेरे
जो आँधियों में चराग़ अपने ये थरथराए तो क्या करोगे

तुम्हारी आँखों में अक्स मेरा अगर न होगा तो कैसा होगा
समाअतों के शजर पे पंछी न चहचहाए तो क्या करोगे

करोगे क्या जो मिरे बदन से धुएँ की इक दिन लकीर उट्ठी
लकीर से फिर हज़ार चेहरे निकल के आए तो क्या करोगे

वो जिन ख़यालों में रह के तुम से मिरी भी पहचान खो गई है
उन्ही ख़यालों के सब मुसाफ़िर हुए पराए तो क्या करोगे

ये सोचते हो चला गया वो तो छत पे जाओगे किस लिए तुम
कि अब के सावन की बारिशों में जो सब नहाए तो क्या करोगे

हैं दस्तरस में अभी भी 'ताहिर' उठा के अब इस को पी भी डालो
मुशाहिदों में ही हो गई गर ये ठंडी चाय तो क्या करोगे