उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye jo ahbab hain mere sabhi katrane lagte hain

ये जो अहबाब हैं मेरे सभी कतराने लगते हैं

یہ جو احباب ہیں میرے سبھی کترانے لگتے ہیں

शायर: Yaseen Barari6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये जो अहबाब हैं मेरे सभी कतराने लगते हैं
न जाने इस ग़रीबी से ये क्यों घबराने लगते हैं

जो सच कहता हूँ मैं तो क्यों बुरा लगता है लोगों को
हर इक जानिब से जो पत्थर मिरे घर आने लगते हैं

जो क़ातिल हैं वो फिरते हैं शरीफ़ों की तरह लेकिन
सितम क्यों बे-गुनाहों पर सितम-गर ढाने लगते हैं

अमीर-ए-शहर जब देखो पड़ा है ऐश-ओ-इशरत में
ग़रीबी के मगर दिन कब उसे याद आने लगते हैं

गुज़ारी साथ में जिन के ख़ुशी की हर घड़ी मैं ने
न जाने क्यों मिरे महबूब अब शरमाने लगते हैं

बुराई इस क़दर दुनिया में बढ़ती जाए है 'यासीन'
जिधर देखो उधर मयख़ाने ही मयख़ाने लगते हैं