उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye aur baat dur rahe manzilon se hum

ये और बात दूर रहे मंज़िलों से हम

یہ اور بات دور رہے منزلوں سے ہم

शायर: Aalok Shrivastav8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस शीर्षक की यह संग्रह प्रविष्टि 2 है। समान शीर्षक के रिकॉर्ड में पाठ या श्रेय का अंतर है; इसे स्वतंत्र आधिकारिक संस्करण का दावा न मानें। अन्य संग्रह प्रविष्टि 1

ये और बात दूर रहे मंज़िलों से हम
बच कर चले हमेशा मगर क़ाफ़िलों से हम

होने को फिर शिकार नई उलझनों से हम
मिलते हैं रोज़ अपने कई दोस्तों से हम

बरसों फ़रेब खाते रहे दूसरों से हम
अपनी समझ में आए बड़ी मुश्किलों से हम

मंज़िल की है तलब तो हमें साथ ले चलो
वाक़िफ़ हैं ख़ूब राह की बारीकियों से हम

जिन के परों से सुब्ह की ख़ुशबू के रंग हैं
बचपन उधार लाए हैं उन तितलियों से हम

गुज़रे हमारे घर की किसी रहगुज़र से वो
पर्दे हटाए देखें उन्हें खिड़कियों से हम

अब तो हमारे बीच कभी दूरियाँ भी हों
तंग आ गए हैं रोज़ की नज़दीकियों से हम

जब भी कहा कि याद हमारी कहाँ उन्हें
पकड़े गए हैं ठीक तभी हिचकियों से हम