उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo pas hai tere dur nahin tu wasil hai mahjur nahin

वो पास है तेरे दूर नहीं तू वासिल है महजूर नहीं

وہ پاس ہے تیرے دور نہیں تو واصل ہے مہجور نہیں

शायर: Pandit Jawahar Nath Saqi10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो पास है तेरे दूर नहीं तू वासिल है महजूर नहीं
क्यूँ हब्ल-ए-मुरक्कब में है फँसा मुख़्तार है तू मजबूर नहीं

सरगर्म-ए-शौक़-ओ-हुज़ूर नहीं दिल सर्द है तू महरूर नहीं
जिस क़ल्ब में 'इश्क़ का नूर नहीं वो ताब-ए-जल्वा-ए-तूर नहीं

हर रंग में है वो जल्वा-नुमा तू एक हिजाब में जा के छपा
क्यूँ कोर सवाद हुआ है बता क्या आँखों में तिरे नूर नहीं

जो 'इश्क़ में बर-सर-ए-दार हुआ सरदार वही सरशार हुआ
सरमस्त विसाल-ए-यार हुआ किस तरह कहें मंसूर नहीं

जो बातिन में मशग़ूल हुए महबूब हुए मक़्बूल हुए
मजहूल हुए मा'रूफ़ कहाँ मशहूर जो हैं मंज़ूर नहीं

क्यूँ महव-ए-सर-ए-पिंदार हुआ ऐ मुश्त-ए-ख़ाक है नक़्श-ए-फ़ना
दुनिया में कहाँ है रंग-ए-बक़ा जमशेद नहीं मग़्फ़ूर नहीं

मस्तूर जो था मंज़ूर हुआ वो जल्वा-ए-रंग-ए-ज़ुहूर हुआ
जो हिजाब था रुख़ से दूर हुआ मुश्ताक़-लक़ा महजूर नहीं

जो आप हुआ बेनाम-ओ-निशाँ उस को है मिला वो जान-ए-जहाँ
मेराज-ए-विसाल है उस को कहाँ जो 'इश्क़ में चकना-चूर नहीं

मैं तेरा फ़िदा-ए-सरापा हूँ मैं तालिब-ए-वस्ल-ए-मुअर्रा हूँ
मुश्ताक़-ओ-शैदा तेरा हूँ मैं तालिब-ए-हूर-ओ-क़ुसूर नहीं

मख़मूर-ए-जाम-ए-बाक़ी है शैदा-ए-नवा-ए-इराक़ी है
सरशार-ए-मोहब्बत 'साक़ी' है सर-मस्त है ये मस्तूर नहीं