उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo dard wo wafa wo mohabbat tamam shud

वो दर्द वो वफ़ा वो मोहब्बत तमाम शुद

وہ درد وہ وفا وہ محبت تمام شد

शायर: Tahir Adeem9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो दर्द वो वफ़ा वो मोहब्बत तमाम शुद
ले दिल में तेरे क़ुर्ब की हसरत तमाम शुद

ये बा'द में खुलेगा कि किस किस का ख़ूँ हुआ
हर इक बयान ख़त्म अदालत तमाम शुद

तू अब तो दुश्मनी के भी क़ाबिल नहीं रहा
उठती थी जो कभी वो अदालत तमाम शुद

अब रब्त इक नया मुझे आवारगी से है
पाबंदी-ए-ख़याल की आदत तमाम शुद

जाएज़ थी या नहीं थी तिरे हक़ में थी मगर
करता था जो कभी वो वकालत तमाम शुद

वो रोज़ रोज़ मरने का क़िस्सा हुआ तमाम
वो रोज़ दिल को चीरती वहशत तमाम शुद

वो मेरे क़ुर्ब में है बहुत बे-सुकून सा
उस के सुकून को है क़राबत तमाम शुद

अब आ कि अपना अपना असासा समेट लें
अब हम पे वक़्त की है सख़ावत तमाम शुद

'ताहिर' मैं कुंज-ए-ज़ीस्त में चुप-चाप हूँ पड़ा
मजनूँ सी वो ख़जालत-ओ-हालत तमाम शुद