उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo aae nigar main na manun

वो आए निगार मैं न मानूँ

وہ آئے نگار میں نہ مانوں

शायर: Pandit Jawahar Nath Saqi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो आए निगार मैं न मानूँ
आ जाए क़रार मैं न मानूँ

वो हमदम ग़ैर हो गया है
दम-साज़ हो यार मैं न मानूँ

दुज़्दीदा नज़र में एक नज़र है
वो हों न दो-चार मैं न मानूँ

जो वक़्त गया वो फिर कहाँ है
छूटे वो शिकार मैं न मानूँ

खटका न हो आमद-ए-ख़िज़ाँ का
ऐ बाग़-ओ-बहार मैं न मानूँ

बाज़ आए तू अपनी शोख़ियों से
ऐ फ़ित्ना-शिआ'र मैं न मानूँ

आराम मिले जहाँ में उस को
तू जिस का हो यार मैं न मानूँ

नालों में तेरे असर हो पैदा
ऐ 'साक़ी'-ए-ज़ार मैं न मानूँ