उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wafa ke raaz se parda nahin uThaungi

वफ़ा के राज़ से पर्दा नहीं उठाऊँगी

وفا کے راز سے پردہ نہیں اٹھاؤں گی

शायर: Sabeela Inam Siddiqui11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वफ़ा के राज़ से पर्दा नहीं उठाऊँगी
मैं दिल के ज़ख़्म तह-ए-दिल से ही छुपाऊँगी

अगर तुम्हारी निगाहों में ये खटकता है
सुनो मैं आज से काजल नहीं लगाऊंगी

उदास दिल हो तो गुलशन भी आह भरता है
ये सच है रोते हुए दिल से मुस्कुराऊँगी

जो मुझ पे गुज़री है अश्कों से वो इबारत है
जो नक़्श दिल में है कैसे उसे मिटाऊँगी

हर एक बात को सुन कर जो अन-सुनी कर दे
उसे मैं दर्द की रूदाद क्या सुनाऊँगी

कभी तो आए वो ऐ ज़िंदगी मिरा बन कर
क़सम ख़ुदा की मैं राहों को भी सजाऊँगी

जो मेरे दिल की सदा ही न सुन सका तो फिर
उसे मैं नौहा-ए-दिल किस तरह सुनाऊँगी

तुम्हारा साथ मुक़द्दर में गर नहीं है लिखा
तो याद बन के मैं दिल में कहीं समाऊँगी

जो ख़्वाब देखे हैं दिल उन से क्यूँ उलझता है
मैं अब ये फ़ल्सफ़ा शायद समझ न पाऊँगी

वो जब मिले तो ये उस से ज़रूर कह देना
वो इस बरस भी न आया तो मर ही जाऊँगी

यक़ीं है रब पे 'सबीला' वो मेरी सुन लेगा
मैं हो के बा-वज़ू हाथों को जब उठाऊँगी