उर्दू शायरी · ग़ज़ल

uThao mai-kasho jitna bhi jam baqi hai

उठाओ मय-कशो जितना भी जाम बाक़ी है

اٹھاؤ مے کشو جتنا بھی جام باقی ہے

शायर: Kaif Husain Banarasi4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उठाओ मय-कशो जितना भी जाम बाक़ी है
कि रक़्स बाक़ी है हू का मक़ाम बाक़ी है

अभी तो 'इश्क़ के असरार खुलने वाले हैं
अभी तो और बहुत एहतिमाम बाक़ी है

असीर-ए-ज़ब्त हूँ सो अपने 'आशिक़ों में मिरा
वो एक रोज़ पुकारेगा नाम बाक़ी है

ख़ुदी को दिल से लगाया तो ये समझ आया
बस एक 'कैफ़' तिरा एहतिराम बाक़ी है