उर्दू शायरी · ग़ज़ल

uske munh ka kaDwa bol bhi kaisa tha

उस के मुँह का कड़वा बोल भी कैसा था

اس کے منہ کا کڑوا بول بھی کیسا تھا

शायर: Rafiq Usmani8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उस के मुँह का कड़वा बोल भी कैसा था
दूध में जैसे शहद मिला हो लगता था

खुली हवा में उड़ते उड़ते मर जाना
क़फ़स में रह कर जीने से तो अच्छा था

शादी हो जाने पर बेटा भूल गया
बेवा माँ ने कैसे उस को पाला था

आज मैं उस का हाथ पकड़ कर चलता हूँ
कल जो मेरी उँगली थामे चलता था

अब तो उस में यादों का है शोर बहुत
मन का आँगन पहले कितना सूना था

सोच रहा था आप मिरे घर में कैसे
आँख खुली तो समझ में आया सपना था

दिन भर हँसता फिरता था जो सड़कों पर
वो पागल तन्हाई में अक्सर रोता था

सर को ऊँचा कर के जो चलता था 'रफ़ीक़'
अस्ल में मुझ से क़द में ज़रा वो छोटा था