उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ulul-azmi na bebaki na chanchal zindagani hai

उलुल-'अज़मी न बेबाकी न चंचल ज़िंदगानी है

اولو العزمی نہ بے باکی نہ چنچل زندگانی ہے

शायर: Dattatriya Kaifi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उलुल-'अज़मी न बेबाकी न चंचल ज़िंदगानी है
तुम्हीं सोचो कि ये कोई जवानी में जवानी है

चलाओ अपनी मर्ज़ी पर पलट दो और बदल डालो
ज़माने की वो गर्दिश है कि दौर-ए-आसमानी है

अगर है जोश सर में और दिल में जज़्बा-ए-सादिक़
तो फिर नार-ए-जहन्नम भी तुम्हारे आगे पानी है

तबाही पर चमन की नौहा-ख़्वानी किस लिए बुलबुल
तू जी मत छोड़ फ़स्ल-ए-गुल फिर आनी है फिर आनी है

जो हैं आज़ाद दिल के उन को क़ैद और बन बराबर हैं
रवाँ पाबंदी-ए-साहिल पे भी दरिया का पानी है

वतन के ग़म से दिल में हो कसक और ख़ून आँखों में
हमारे हक़ में क्या कम ये नवेद-ए-शादमानी है

ज़रूरत है वतन को तेरे ईसार-ए-मुकम्मल की
अगर जज़्बा तिरा ख़ालिस निरा हिन्दोस्तानी है

सिवा हक़ के किसी के आगे वो झुकते नहीं 'कैफ़ी'
ये मर्दान-ए-ख़ुदा की शान ये उन की निशानी है