उर्दू शायरी · ग़ज़ल

teri aawaz par ruke hi nahin

तिरी आवाज़ पर रुके ही नहीं

تری آواز پر رکے ہی نہیں

शायर: Babar Ali Asad7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरी आवाज़ पर रुके ही नहीं
सो कई वाक़िए हुए ही नहीं

उस ने जितने दिए मैं ले आया
मुफ़्त के साँस थे गिने ही नहीं

मो'जिज़े वक़्त पर नहीं होते
सानेहे वक़्त देखते ही नहीं

झूठ है दिल-ब-दर किए गए हैं
सच कहें हम वहाँ पे थे ही नहीं

सब हक़ीक़त-पसंद हो गए हैं
लोग अब ख़्वाब देखते ही नहीं

जो तिरे नाम में नहीं आते
ऐसे हर्फ़ों को जानते ही नहीं

रिस रहे हैं जगह जगह से 'असद'
उस ने कुछ ज़ख़्म तो सिए ही नहीं