उर्दू शायरी · ग़ज़ल

suKHan ki sham jali hai chamak uThi hai ghazal

सुख़न की शम' जली है चमक उठी है ग़ज़ल

سخن کی شمع جلی ہے چمک اٹھی ہے غزل

शायर: V.C. Ray4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सुख़न की शम' जली है चमक उठी है ग़ज़ल
कहीं से साज़ छिड़ा और थिरक उठी है ग़ज़ल

तिरे ख़यालों में गुम हो के देखा है अक्सर
तू सोज़ बन के जगा और झलक उठी है ग़ज़ल

मिरा ये दिल तो जला है चराग़ बन के सदा
लहू के क़तरे ही पी कर महक उठी है ग़ज़ल

वो लाख पर्दा-नशीं हो ज़माना-भर के लिए
मिरी पुकार पे तो बे-झिझक उठी है ग़ज़ल