उर्दू शायरी · ग़ज़ल

siyahi Dhal ke palkon par bhi aae

सियाही ढल के पलकों पर भी आए

سیاہی ڈھل کے پلکوں پر بھی آئے

शायर: Kabir Ajmal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सियाही ढल के पलकों पर भी आए
कोई लम्हा धनक बन कर भी आए

गुलाबी सीढ़ियों से चाँद उतरे
ख़िराम-ए-नाज़ का मंज़र भी आए

लहू रिश्तों का अब जमने लगा है
कोई सैलाब मेरे घर भी आए

मैं अपनी फ़िक्र का कोह-ए-निदा हूँ
कोई हातिम मिरे अंदर भी आए

मैं अपने आप का क़ातिल हूँ 'अजमल'
मिरा आसेब अब बाहर भी आए