उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shar ki baaton mein tamazat ka nishan ho ki na ho

शर की बातों में तमाज़त का निशाँ हो कि न हो

شر کی باتوں میں تمازت کا نشاں ہو کہ نہ ہو

शायर: Jafar Sahni9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शर की बातों में तमाज़त का निशाँ हो कि न हो
आग लगती है तो सीने में धुआँ हो कि न हो

शौक़ को अपने ज़रा तेज़-क़दम ही रखना
थामने हाथ कभी बाद-ए-रवाँ हो कि न हो

सैल के ग़ैज़ से लर्ज़ां है तसव्वुर का बदन
बहते पानी के तकल्लुम से गुमाँ हो कि न हो

दिल के ख़ाने में कशिश ख़ूब मिली है रौशन
उस की महफ़िल का समाँ रश्क-ए-जिनाँ हो कि न हो

दर्द-मंदी की फ़ज़ा हम तो करेंगे क़ाएम
सेहन-ए-दिलदार लिए अक्स-ए-फ़ुग़ाँ हो कि न हो

अपनी पलकों पे चलो आज नमी कुछ भर लें
शबनमी हुस्न में तर फिर से जहाँ हो कि न हो

मुझ को मौजूद तो हर मोड़ पे वो लगता है
चाँद तारों की निगारिश से अयाँ हो कि न हो

सोच रहती है अक़ीदत से शराबोर सदा
नर्म लहजे में दुआ विर्द-ए-ज़बाँ हो कि न हो

मैं तो मश्कूक नहीं उस की वफ़ा से 'जाफ़र'
एक मौहूम इशारे में भी हाँ हो कि न हो