उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shabnam shabnam palken thin aur surKHi thi ruKHsaron par

शबनम शबनम पलकें थीं और सुर्ख़ी थी रुख़्सारों पर

شبنم شبنم پلکیں تھیں اور سرخی تھی رخساروں پر

शायर: Tafzeel Tabish5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शबनम शबनम पलकें थीं और सुर्ख़ी थी रुख़्सारों पर
फूल समझ कर मैं ने अपने होंट रखे अंगारों पर

शहरों शहरों अम्न अमाँ का दर्स जो देते फिरते हैं
मा'सूमों के ख़ून के छींटे हैं उन की दस्तारों पर

ऐसा लगता है अब रोटी नील-गगन से उतरेगी
भूके बच्चे की नज़रें हैं रौशन चाँद-सितारों पर

उस ने अपनी जन्नत का इक ख़ाका है तय्यार किया
जिस ने दिल-कश नक़्श उतारे मस्जिद के मीनारों पर

जैसे तुम्हारे ख़्वाबों की है इन ही में ता'बीर लिखी
सुब्ह हुई और 'ताबिश' तुम तो टूट पड़े अख़बारों पर