उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ajnabi har zehn hai har ek nazar anjaan hai

अजनबी हर ज़ह्न है हर इक नज़र अंजान है

اجنبی ہر ذہن ہے ہر اک نظر انجان ہے

शायर: Tafzeel Tabish6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अजनबी हर ज़ह्न है हर इक नज़र अंजान है
किस क़दर रूठा हुआ इंसान से इंसान है

बाँट ले ग़म को ख़ुशी को रंज को तकलीफ़ को
दर्द-मंद इंसान की बस इक यही पहचान है

किस क़दर अफ़्सोस की है बात हम सब हैं जुदा
अपना रहबर अपनी मंज़िल जब कि इक क़ुरआन है

बेबसी बेचारगी मजबूरियाँ ख़ुद्दारियाँ
चंद रोज़ा ज़िंदगी का अपनी ये सामान है

आज़मा ले हक़ है तुझ को जब भी जी चाहे मुझे
ज़िंदगी तुझ पर मिरी हर साँस अब क़ुर्बान है

हाथ फैलाता नहीं 'ताबिश' किसी के सामने
देने वाला बस ख़ुदा है अपना ये ईमान है