उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shab-e-gham soz-e-gham se tan-badan mein aag lagti hai

शब-ए-ग़म सोज़-ए-ग़म से तन-बदन में आग लगती है

شب غم سوز غم سے تن بدن میں آگ لگتی ہے

शायर: Ghalib Hashmi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शब-ए-ग़म सोज़-ए-ग़म से तन-बदन में आग लगती है
चराग़-ए-आरज़ू बुझता है मन में आग लगती है

ख़िज़ाँ का दौर आते ही झुलस जाते हैं बर्ग-ए-गुल
बहार आँसू बहाती है चमन में आग लगती है

निगाह-ए-बर्क़-सामाँ पर ग़लत है बारिश-ए-तोहमत
प चुप रहती है फिर भी तन-बदन में आग लगती है

सबील ऐसी हो कोई बर्क़-ए-सोज़ाँ सर्द पड़ जाए
नशेमन को बचाता हूँ चमन में आग लगती है

निगाहों के तसादुम पर निगाहों से शिकायत क्या
ये ऐसा हादसा है मन ही मन में आग लगती है

त'अल्ली बरतरफ़ 'ग़ालिब' ये हुस्न-ए-शे'र-गोई है
मिरे सोज़-ए-सुख़न से अहल-ए-फ़न में आग लगती है