उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab ahl-e-zauq KHwahish-mand hain aise suKHan-dan ke

अब अहल-ए-ज़ौक़ ख़्वाहिश-मंद हैं ऐसे सुख़न-दाँ के

اب اہل ذوق خواہش مند ہیں ایسے سخنداں کے

शायर: Ghalib Hashmi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब अहल-ए-ज़ौक़ ख़्वाहिश-मंद हैं ऐसे सुख़न-दाँ के
जो अपने शे'र-ओ-नग़्मा से बदल दे ज़ह्न इंसाँ के

बहुत चक्कर लगाए हम ने सहरा-ओ-गुलिस्ताँ के
मगर भूले नहीं वो ख़म किसी की ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ के

ज़माने की रविश पर चल के मैं उस मोड़ पर पहुँचा
जहाँ बे-बस है इंसाँ सैकड़ों दुश्मन हैं इंसाँ के

मुझे दर्द-ए-मोहब्बत चैन से जीने नहीं देता
बहुत ही दिल-शिकन बरताओ हैं उस आफ़त-ए-जाँ के

अगर मेरे जुनूँ का साया पड़ जाए गुलिस्ताँ पर
बहार-ए-गुलसिताँ चुनती फिरे काँटे बयाबाँ के

कलाम-ए-'मिर्ज़ा-ग़ालिब' में ऐ 'ग़ालिब' वो लताफ़त है
तबर्रुक की तरह बाँटे गए अश'आर दीवाँ के