उर्दू शायरी · ग़ज़ल

riwaj-o-rasm na ghar-bar ke musafir hain

रिवाज-ओ-रस्म न घर-बार के मुसाफ़िर हैं

رواج و رسم نہ گھر بار کے مسافر ہیں

शायर: Tahir Adeem9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रिवाज-ओ-रस्म न घर-बार के मुसाफ़िर हैं
हम और लोग हैं उस पार के मुसाफ़िर हैं

सफ़र क़दीम से दरपेश कौन सा है हमें
न जाने कौन सी दीवार के मुसाफ़िर हैं

न मंज़िलों का तअ'य्युन न रास्तों की ख़बर
हम ऐसे लोग तो बे-कार के मुसाफ़िर हैं

न सर में डर है कहीं का न ख़ौफ़-ए-जौर-ओ-सितम
अज़ाब रास हैं आज़ार के मुसाफ़िर हैं

हैं फ़र्श-ए-राह बलाएँ तो हम-क़दम आसेब
किसी जहान पर असरार के मुसाफ़िर हैं

मिले अगर तो भरे ख़ुशबुएँ ख़यालों में
कि दस्त-ए-यार-ए-तरह-दार के मुसाफ़िर हैं

बिना-ए-रख़्त बिना-ए-सफ़र तवक्कुल है
मदद न दस्त-ए-मदद-गार के मुसाफ़िर हैं

शुमार-ए-मौज़ूअ'-ए-फ़ितरत में सर खपाते हैं
सरों में दौड़ते अफ़्कार के मुसाफ़िर हैं

वो दोस्ती हो अदावत हो कुछ भी हो 'ताहिर'
हर एक चीज़ में मेआ'र के मुसाफ़िर हैं