उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rakkhe har ek qadam pe jo mushkil ki aagahi

रक्खे हर इक क़दम पे जो मुश्किल की आगही

رکھے ہر اک قدم پہ جو مشکل کی آگہی

शायर: Sabeela Inam Siddiqui8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रक्खे हर इक क़दम पे जो मुश्किल की आगही
मिलती है उस को राह से मंज़िल की आगही

सीखा है आदमी ने कई तजरबों के बा'द
तूफ़ान से ही मिलती है साहिल की आगही

उस का ख़ुदा से राब्ता ही कुछ अजीब है
दुनिया कहाँ समझती है साइल की आगही

नज़रों का ए'तिबार तो है फिर भी मेरा दिल
है इक सहीफ़ा जिस में मसाइल की आगही

दिन-रात जिस के प्यार में रहती हूँ बे-क़रार
उस को नहीं है क्यूँ दिल-ए-बिस्मिल की आगही

यादों के इक हुजूम में रह कर पता चला
तन्हाई भी तो रखती है महफ़िल की आगही

ख़ंजर का ए'तिबार नहीं वो तो साफ़ है
लेकिन मिलेगी ख़ून से क़ातिल की आगही

मश्क़-ए-सुख़न 'सबीला' निखारेगी फ़न को और
मतलूब है कुछ और अभी दिल की आगही