उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rah-e-justuju mein bhaTak gae to kisi se koi gila nahin

रह-ए-जुस्तुजू में भटक गए तो किसी से कोई गिला नहीं

رہ جستجو میں بھٹک گئے تو کسی سے کوئی گلا نہیں

शायर: Iffat abbas5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रह-ए-जुस्तुजू में भटक गए तो किसी से कोई गिला नहीं
कि हम उस के हो के न जी सके वो हमारा बन के मिला नहीं

मिरे फ़िक्र-ओ-फ़न पे मुहीत है जो तसव्वुर एक ख़ुदा-नुमा
है तलाश उस की नहीं पता वो ख़ुदा भी है कि ख़ुदा नहीं

जो मिली नहीं मुझे आगही है मिरी निगाह से अजनबी
हो रग-ए-गुलू से क़रीब भी तो यही कहेंगे मिला नहीं

जो बसीर हो वो नज़र भी दे मुझे आगही का हुनर भी दे
मगर अब तू मेरी ख़बर भी दे कि मुझे ख़ुद अपना पता नहीं

हैं 'शहाब' मेरे हवास गुम कि हर एक शब है शब-ए-दहुम
जो बुझा तो बुझ के ही रह गया है चराग़ फिर से जला नहीं