उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rabt sahra se arsh ka dekha

रब्त सहरा से अर्श का देखा

ربط صحرا سے عرش کا دیکھا

शायर: Jagdeesh Raj Figar14 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रब्त सहरा से अर्श का देखा
बादलों का जो क़ाफ़िला देखा

कहकशाँ का वो अक्स ही तो था
मैं ने लहरों में रास्ता देखा

डाली डाली पे बैठ कर मैं ने
फल चखा और ज़ाइक़ा देखा

चर्ख़ का पैरहन तो मैला था
दह्र का पैरहन नया देखा

इतना ही क़ुर्ब का हुआ एहसास
जितना माबैन फ़ासला देखा

जाएज़ा जब लिया बुलंदी का
शेब से उस का वास्ता देखा

यूँ लगा हर जवाँ मुअम्मर है
उस के हाथों में जो असा देखा

वो तो बगुले का हम-नवा होगा
जिस को मैं टाँग पर खड़ा देखा

बे-कराँ इस लिए हुआ सागर
उस ने साहिल को जो ख़फ़ा देखा

क्या गगन अर्ज़ की कशिश में था
उस को जो ख़ाक से अटा देखा

मीर-ए-मैदाँ की तो है बात अलग
क्या मिरा रन में हौसला देखा

सर जुदा था शरीर से जैसे
मैं ने बस पेड़ का तना देखा

हर तरह उस का एहतिराम किया
जिस को अपने से कुछ बड़ा देखा

तू तो मैदान का मकीं था 'फ़िगार'
कब पहाड़ों का सिलसिला देखा