उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pichha hi nahin chhoDti ghar bar ki KHushbu

पीछा ही नहीं छोड़ती घर बार की ख़ुश्बू

پیچھا ہی نہیں چھوڑتی گھر بار کی خوشبو

शायर: Jafar Sahni8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पीछा ही नहीं छोड़ती घर बार की ख़ुश्बू
रस्ते से अयाँ है दर-ओ-दीवार की ख़ुश्बू

कब कैसे कहाँ से बनी पुर-पेच गली में
बेचैन किए रहती है असरार की ख़ुश्बू

मैं अपने तसव्वुर में हूँ ख़ुश-हाल बरादर
क़दमों में पड़ी है मिरे दरबार की ख़ुश्बू

तुम अजनबी क़दमों से निकल जाओ मुसाफ़िर
पाना है किसी और को गुलज़ार की ख़ुश्बू

अश्कों के झरोके में भी दर आई है अक्सर
हैरान तबस्सुम में बसी यार की ख़ुश्बू

इक गुल पे क़नाअत है कहाँ बहती हवा को
हर-वक़्त लिए फिरती है दो-चार की ख़ुश्बू

बरसों जो रही दफ़्न किसी ज़ख़्म-ए-जिगर में
पायल से उगी आज वो झंकार की ख़ुश्बू

आवाज़ पे तकिया न लगाना कभी 'जाफ़र'
ख़ामोश सदा देती है उस पार की ख़ुश्बू