उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nae fitnon ke har jaanib se itne sar nikal aae

नए फ़ित्नों के हर जानिब से इतने सर निकल आए

نئے فتنوں کے ہر جانب سے اتنے سر نکل آئے

शायर: Saadat Bandvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नए फ़ित्नों के हर जानिब से इतने सर निकल आए
ज़मीं पर जिस तरह सब्ज़ा नमी पा कर निकल आए

बहुत होशियार लोगो इस नई तारीख़ के हाथों
न जाने कब तुम्हारा घर किसी का घर निकल आए

कहीं के फूल-पत्ते हैं कहीं के फल कहीं के हैं
कुछ ऐसे पेड़ भी भारत की धरती पर निकल आए

दर-ए-तक़दीस को जब वा किया तो क़स्र-ए-हुर्मत से
बताऊँ क्या तुम्हें कि कितने सौदागर निकल आए

तुम्हारा और तुम्हारे नज़्म का उस रोज़ क्या होगा
कभी सोचा है दीवारों में जिस दिन दर निकल आए

'सआदत' आप इस दीदा-वरों की भीड़ में ढूँढें
बहुत मुमकिन है उन में कोई दीदा-वर निकल आए