उर्दू शायरी · ग़ज़ल

naw dariya mein chale samne manjdhaar bhi ho

नाव दरिया में चले सामने मंजधार भी हो

ناؤ دریا میں چلے سامنے منجدھار بھی ہو

शायर: Zafar Imam6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नाव दरिया में चले सामने मंजधार भी हो
डूब जाने के लिए हर कोई तय्यार भी हो

कैसे रोकेगा सफ़र में कोई रस्ता जब कि
दिल में इक जोश भी हो पाँव में रफ़्तार भी हो

सारी उम्मीदें इसी एक सहारे की तरफ़
ना-उमीदी के सफ़र में वही दीवार भी हो

हर तरफ़ से नए इल्ज़ाम की बारिश मुझ पर
अपने होने का ये एहसास-ए-गुनाह-गार भी हो

जिस दुआ के लिए वो रात कटी आँखों में
वो दुआ ख़ुद से गुज़र जाने का आज़ार भी हो

फ़ातिहा अपने गुनाहों का भी पढ़ता है 'ज़फ़र'
ज़िंदा एहसास के हो जाने से बेज़ार भी हो