उर्दू शायरी · ग़ज़ल

munh-andhere hi koi ghar se nikalta hua tha

मुँह-अँधेरे ही कोई घर से निकलता हुआ था

منہ اندھیرے ہی کوئی گھر سے نکلتا ہوا تھا

शायर: Nadeem ahmad5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुँह-अँधेरे ही कोई घर से निकलता हुआ था
एक मंज़र था कि मंज़र से निकलता हुआ था

एक ख़िल्क़त कि न होने में फँसी जाती थी
और मैं होने के चक्कर से निकलता हुआ था

कुछ तो वो ख़ुद ही चला आया था बाहर बाहर
और कुछ मैं भी अब अंदर से निकलता हुआ था

ख़ूब रौशन सी कोई चीज़ मिरे सामने थी
और धुआँ था कि मिरे सर से निकलता हुआ था

मुद्दतों यूँ ही तह-ए-बाल चले आते थे
आसमाँ था कि मिरे पर से निकलता हुआ था