उर्दू शायरी · ग़ज़ल

miyan-e-sang-o-aina dalil-e-motabar rakh di

मियान-संग-ओ-आईना दलील-ए-मो'तबर रख दी

میان سنگ و آئینہ دلیل معتبر رکھ دی

शायर: Qaisar Siddiqi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मियान-संग-ओ-आईना दलील-ए-मो'तबर रख दी
नहीं दिल रख दिया अपना नहीं अपनी नज़र रख दी

अँधेरों ने शिकस्त-ए-फ़ाश दे दी है उजालों को
जबीन-ए-लौह पर ये वक़्त ने ऐसी ख़बर रख दी

मकान-ओ-ला-मकाँ इक लफ़्ज़-ए-कुन की कारसाज़ी हैं
इसी इक लफ़्ज़ ने गोया बिना-ए-ख़ैर-ओ-शर रख दी

जुनून-ए-शौक़ मेरा ले तो आया मुझ को मंज़िल तक
मगर तक़दीर ने दामन में कुछ गर्द-ए-सफ़र रख दी

सफ़र से लौट कर आया तो कुछ ऐसा लगा मुझ को
मिरे क़दमों के नीचे फिर किसी ने रह-गुज़र रख दी

मिरी वीरानियों को जिस के जलवों का सहारा था
हवाओं ने वो इक तस्वीर-ए-गुल भी फाड़ कर रख दी

ब-क़द्र-ए-होश ऐ 'क़ैसर' बस इतना याद है मुझ को
मिरी नज़रों ने कोई शय उठा कर ताक़ पर रख दी