उर्दू शायरी · ग़ज़ल

charagh-e-nur mayassar hua na sinon ko

चराग़-ए-नूर मयस्सर हुआ न सीनों को

چراغ نور میسر ہوا نہ سینوں کو

शायर: Qaisar Siddiqi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चराग़-ए-नूर मयस्सर हुआ न सीनों को
सियाह करते रहे मुफ़्त में जबीनों को

इसी लिए कि बनाएँ फ़लक ज़मीनों को
ज़मीन सौंपी गई हम फ़लक-नशीनों को

सुना है साँप भी पलते हैं आस्तीनों में
हमेशा झाड़ते रहिएगा आस्तीनों को

हवा-ए-गेसू-ए-जानाँ बहुत ही सर्द सही
बुझा सके तो बुझा दे मिरे पसीनों को

दिलों की आग बुझा लो कि रौशनी की तरह
मकान चाट न जाए कहीं मकीनों को

उन्हीं के दम से मिली है ये रौशनी 'क़ैसर'
हयात-ए-'ख़िज़्र' मिले मेरे नुक्ता-चीनों को