उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main sochta hun wahi kuchh jo is sadi ka hai

मैं सोचता हूँ वही कुछ जो इस सदी का है

میں سوچتا ہوں وہی کچھ جو اس صدی کا ہے

शायर: Tab Aslam5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं सोचता हूँ वही कुछ जो इस सदी का है
कि अब तो गहरा बहुत ज़ख़्म आगही का है

अगर तू शब की चटानें नहीं तराश सका
तो क्या क़ुसूर सितारों की रौशनी का है

उभर के ज़ख़्म-ए-वफ़ा आ गए हैं आँखों में
वो हाल शीशा-ए-दिल की शिकस्तगी का है

उसे मैं सुब्ह-ए-बहाराँ का नाम कैसे दूँ
कि गर्द गर्द सा चेहरा कली कली का है

जलेगा 'ताब' कहाँ तक हवा के हाथों में
ये इक चराग़ जो सीने में ज़िंदगी का है