उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main chup rahun to bhi andar pukarta hai koi

मैं चुप रहूँ तो भी अंदर पुकारता है कोई

میں چپ رہوں تو بھی اندر پکارتا ہے کوئی

शायर: Lateef Saani8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं चुप रहूँ तो भी अंदर पुकारता है कोई
मिरे ग़ुरूर की पगड़ी उतारता है कोई

मैं जब भी माँ के तसव्वुर में डूब जाता हूँ
नज़र के सामने बाँहें पसारता है कोई

मिरे अमल से मुक़द्दर अगर बिगड़ जाए
ख़ुदा के फ़ज़्ल से क़िस्मत सँवारता है कोई

अजीब शख़्स है हर बार जीत जाता है
कि जीत कर भी ज़माने में हारता है कोई

तमाम दिन तो गुज़रता है ग़म की चौखट पर
कि छत से रात में तारे शुमारता है कोई

मिली है ज़िंदगी मिल-जुल के साथ रह लेते
तमाम उम्र क्यों तन्हा गुज़ारता है कोई

लबों पे ज़िक्र-ए-ख़ुदा मैं सजाए रखता हूँ
मैं डूब जाऊँ तो मुझ को उभारता है कोई

हर एक राह मुनव्वर दिखाई दे 'सानी'
तिरे वजूद का सदक़ा उतारता है कोई