उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main agar dil jala nahin hota

मैं अगर दिल जला नहीं होता

میں اگر دل جلا نہیں ہوتا

शायर: Jagjit Kafir8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं अगर दिल जला नहीं होता
शे'र कोई कहा नहीं होता

अज़्मत-ए-इश्क़ है कि झुकता हूँ
कोई पैकर ख़ुदा नहीं होता

बाँस के शहर में बसे लोगो
हर शजर खोखला नहीं होता

बस वही रात दिन की गर्दिश है
और कुछ भी नया नहीं होता

रास आने लगी है फ़ुर्क़त भी
इन दिनों ग़म-ज़दा नहीं होता

अपनी वहशत से ख़ौफ़ खाता हूँ
ज़ब्त हर मर्तबा नहीं होता

एक सागर छुपा है आँखो में
सिर्फ़ आँसू छुपा नहीं होता

मसअला ज़िंदगी का है 'काफ़िर'
मौत में कुछ बुरा नहीं होता