उर्दू शायरी · ग़ज़ल

lahuluhan hain hum aur jaan-balab bhi nahin

लहूलुहान हैं हम और जाँ-बलब भी नहीं

لہولہان ہیں ہم اور جاں بلب بھی نہیں

शायर: Danish Farahi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

लहूलुहान हैं हम और जाँ-बलब भी नहीं
सितम-शि’आरों को एहसास इस का अब भी नहीं

जब इख़्तियार सपेद-ओ-स्याह का था हमें
हमारे घर में फ़रोज़ाँ थी शम' तब भी नहीं

लुटा दी जिस के लिए सब मता’-ए-क़ल्ब-ओ-जिगर
उसी को मेरी वफ़ा का यक़ीन अब भी नहीं

सुनेगा कौन वहाँ दास्तान-ए-ग़म मेरी
मैं उस की बज़्म में इक हर्फ़-ए-ज़ेर-ए-लब भी नहीं

बसर जो होती तिरे गेसुओं के साए में
मिरे नसीब में ऐसी तो एक शब भी नहीं

उन्हें तो आप न ठहराएँ मूरिद-ए-इल्ज़ाम
सितम-नसीब हैं लेकिन वो बे-अदब भी नहीं

निगाह फेर ले दुनिया जो मेरी जानिब से
मैं ऐसा दोस्तो बे-नाम बे-नसब भी नहीं

करम-नवाज़ियाँ उन की भी हैं 'अजब 'दानिश'
कि आँख नम भी नहीं शिकवा-संज लब भी नहीं