उर्दू शायरी · ग़ज़ल

har samt qatl-gah ka manzar hai aaj bhi

हर सम्त क़त्ल-गाह का मंज़र है आज भी

ہر سمت قتل گاہ کا منظر ہے آج بھی

शायर: Danish Farahi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हर सम्त क़त्ल-गाह का मंज़र है आज भी
पोशीदा आस्तीनों में ख़ंजर है आज भी

है अम्न और 'अद्ल का शोहरा बहुत मगर
सरगर्म-ए-कार दस्त-ए-सितमगर है आज भी

जो मुद्दतों से लूटता आया है दोस्तो
अफ़सोस क़ौम का वही रहबर है आज भी

तुम से जुदा हुए तो ज़माना हुआ मगर
साया तुम्हारी ज़ुल्फ़ों का सर पर है आज भी

तू मेहरबाँ था मुझ पे कभी याद है मुझे
क्या तू वही ख़ुलूस का पैकर है आज भी

तामीर-ए-नौ के दौर में अहल-ए-मकाँ हैं सब
'दानिश' है एक शख़्स जो बे-घर है आज भी