उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hasin mausam mein koi zulf bikhrae to kya hoga

हसीं मौसम में कोई ज़ुल्फ़ बिखराए तो क्या होगा

حسیں موسم میں کوئی زلف بکھرائے تو کیا ہوگا

शायर: Danish Farahi4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हसीं मौसम में कोई ज़ुल्फ़ बिखराए तो क्या होगा
अगर मेरी निगाह-ए-शौक़ उठ जाए तो क्या होगा

भुलाने का मैं उस को किस तरह वा'दा करूँ नासेह
भुलाने पर भी वो ज़ालिम जो याद आए तो क्या होगा

लिए जाता है दिल महफ़िल में उस रश्क-ए-मसीहा की
ये दर्द-ए-दिल अगर कुछ और बढ़ जाए तो क्या होगा

भरोसा कर रहे हो उन हसीनों पर मगर 'दानिश'
ये अंदाज़-ए-हसीं उन का बदल जाए तो क्या होगा