उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kyun na afsana-e-gham kaif ka unwan Thahre

क्यूँ न अफ़्साना-ए-ग़म कैफ़ का उनवाँ ठहरे

کیوں نہ افسانۂ غم کیف کا عنواں ٹھہرے

शायर: Qaisar Siddiqi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्यूँ न अफ़्साना-ए-ग़म कैफ़ का उनवाँ ठहरे
शिद्दत-ए-दर्द ही जब दर्द का दरमाँ ठहरे

जिस जगह हम सा कोई चाक-ए-गरेबाँ ठहरे
शौक़ से आ के वहाँ फ़स्ल-ए-बहाराँ ठहरे

उस के दामन की तरफ़ हाथ बढ़ाऊँ कैसे
जिस के दामन की महक शो'लगी-ए-जाँ ठहरे

मंज़िलें आती हैं और आ के गुज़र जाती हैं
देखिए जा के कहाँ क़ाफ़िला-ए-जाँ ठहरे

पिछले वा'दे जो नहीं याद तो क्या बात हुई
फिर कोई अहद-ए-वफ़ा फिर कोई पैमाँ ठहरे

आप को देखूँ तो हो दूर मिरी तिश्ना-लबी
आप आ जाएँ तो जज़्बात का तूफ़ाँ ठहरे

शोख़ी-ए-दस्त-ए-सबा से तो कोई कुछ न कहे
मेरे सर तोहमत-ए-गेसू-ए-परेशाँ ठहरे