उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kya hua markaz-e-hasti agar insan na hua

क्या हुआ मरकज़-ए-हस्ती अगर इंसाँ न हुआ

کیا ہوا مرکز ہستی اگر انساں نہ ہوا

शायर: Dattatriya Kaifi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्या हुआ मरकज़-ए-हस्ती अगर इंसाँ न हुआ
आबरू ख़ाक है क़तरे की जो तूफ़ाँ न हुआ

सख़्त मुश्किल है कि हिम्मत ये हुई सहल-पसंद
ग़ैर-मुमकिन रहा वो काम जो आसाँ न हुआ

शर्म भी आती है ये कहते और अफ़सोस भी है
आदमी यूँ तो सभी कुछ हुआ इंसाँ न हुआ

जामा पहने रहा परवानों की जाँ-बाज़ी का
शो'ला फ़ानूस के पर्दे में भी उर्यां न हुआ

कर गया आँखों को ख़ीरा वो फ़रोग़-ए-जल्वा
किस लिए नूर-ए-हुदा पर्दे में पिन्हाँ न हुआ

खेल समझा किए 'आलम के करिश्मों को हम
दिल-ए-ख़ुद-रफ़्ता किसी बात से हैराँ न हुआ

फिर 'अजब क्या है 'अदम से जो हुई दिलचस्पी
दर्खुर-ए-वुस'अत-ए-दिल ‘आलम-ए-इम्काँ न हुआ

हैं मिरे दिल में वो आहें न बनें जो बिजली
मेरी आँखों में वो क़तरा है जो तूफ़ाँ न हुआ

हौसला किस को है दिल चीर के दिखलाऊँ किसे
वो शरर इस में है जो संग में पिन्हाँ न हुआ

ग़म रहा उन को जो दोज़ख़ में पड़े जलते हैं
मेरे ख़ुश होने का जन्नत में भी सामाँ न हुआ

दो जगह दैर में या दार पे तुम 'कैफ़ी' को
काफ़िर-ए-‘इश्क़ कभी दुश्मन-ए-ईमाँ न हुआ