उर्दू शायरी · ग़ज़ल

koi bhi uqda-kusha-e-KHud-agahi na mila

कोई भी उक़्दा-कुशा-ए-ख़ुद-आगही न मिला

کوئی بھی عقدہ کشائے خود آگہی نہ ملا

शायर: Rabab Rashidi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोई भी उक़्दा-कुशा-ए-ख़ुद-आगही न मिला
मैं अपने आप से भी आज तक कभी न मिला

मुशाहिदात पे क़ुदरत न तजरबात पे नाज़
हमें तो कोई हुनर तुझ से ज़िंदगी न मिला

शुऊ'र-ए-राहबरी राह देखता कब तक
उस आदमी की जिसे ज़ौक़-ए-रह-रवी न मिला

दयार-ए-शौक़ में सब कुछ मुझे नज़र आया
मगर गया था मैं जिस के लिए वही न मिला

बड़ा अजीब है महरूमियों का रिश्ता भी
कोई भी शख़्स कहीं मुझ को अजनबी न मिला

बताएँ क्या तुम्हें उस क़ाफ़िले के बारे में
कि हम को राह में जिस का ग़ुबार भी न मिला

'रबाब' अपने ही चेहरे पे जम गईं नज़रें
जब आइनों में कोई और अक्स ही न मिला