उर्दू शायरी · ग़ज़ल

apni KHush-zauqi pe ek ilzam ho kar rah gae

अपनी ख़ुश-ज़ौक़ी पे इक इल्ज़ाम हो कर रह गए

اپنی خوش ذوقی پہ اک الزام ہو کر رہ گئے

शायर: Rabab Rashidi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अपनी ख़ुश-ज़ौक़ी पे इक इल्ज़ाम हो कर रह गए
नाम वाले थे बराए-नाम हो कर रह गए

आइनों में कोई वाज़ेह अक्स क्यों आने लगा
जब हमीं मिन-जुमला-ए-औहाम हो कर रह गए

कितने साए ज़िंदगी की इक अलामत बन गए
कितने जज़्बे ज़ेहन का इबहाम हो कर रह गए

हम भी क्या कहते किसी से लोग क्या पहचानते
तेरे घर की सुब्ह थे और शाम हो कर रह गए

राह में टूटे हुए पर उड़ने वालों के लिए
कैसे कैसे हल्क़ा-हा-ए-दाम हो कर रह गए

उम्र भर परछाइयाँ अपने तआ'क़ुब में रहीं
जब हक़ाएक़ से बचे बदनाम हो कर रह गए

उन के दामन से ज़रा सा फ़ासला क्या बढ़ गया
हम रहीन-ए-गर्दिश-ए-अय्याम हो कर रह गए