उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kisi se KHauf khate hain na dab kar baat karte hain

किसी से ख़ौफ़ खाते हैं न दब कर बात करते हैं

کسی سے خوف کھاتے ہیں نہ دب کر بات کرتے ہیں

शायर: Zaheer Ahmad Zaheer6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किसी से ख़ौफ़ खाते हैं न दब कर बात करते हैं
सदाक़त के पयम्बर जब भी हक़ पर बात करते हैं

नहीं है हौसला जिन में हक़ीक़त पेश करने का
न आते रू-ब-रू हैं वो न खुल कर बात करते हैं

बता देते हैं अहवाल-ए-दिल-ओ-राज़-ए-निहाँ चेहरे
ख़मोशी हो लबों पर लाख तेवर बात करते हैं

नहीं शेवा हमारा फिर मुकरने का बदलने का
जो दिल में है ज़बाँ से हम वो खुल कर बात करते हैं

सबब ख़ुद आप ही बनते हैं वो अपनी तबाही का
हसद की आग में जो लोग जल कर बात करते हैं

हमारा ही जिगर है ये हमारा हौसला है ये
हो दिल पे ज़ख़्म गहरा भी तो हँस कर बात करते हैं