उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHwahishon ka wird yun mat kar parae shahr mein

ख़्वाहिशों का विर्द यूँ मत कर पराए शहर में

خواہشوں کا ورد یوں مت کر پرائے شہر میں

शायर: Iftikhar Qaisar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़्वाहिशों का विर्द यूँ मत कर पराए शहर में
फ़ाख़्ता मर जाएगी घुट कर क़बा-ए-शहर में

रात भर दिल में समुंदर करवटें लेता रहा
रात भर बहता रहा दरिया पराए शहर में

रौशनी होते ही काली आँधियाँ चलने लगीं
बुझ गए जितने दिए हम ने जलाए शहर में

ज़िंदगी के पेड़ से कुछ फूल भी लिपटे रहे
पत्थरों की भी रिहाइश थी रिदा-ए-शहर में

जी रहा हूँ भूक के पंजे को साँसें बेच कर
फिर रहा हूँ लाश मैं अपनी उठाए शहर में

शाम तक था खिड़कियों में पिछड़ी आँखों का हुजूम
चाँदनी फैली तो आँसू थे हवा-ए-शहर में