उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHamosh nigahon se wo yalghaar ka hona

ख़ामोश निगाहों से वो यलग़ार का होना

خاموش نگاہوں سے وہ یلغار کا ہونا

शायर: Jafar Sahni8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ामोश निगाहों से वो यलग़ार का होना
मिलता है नफ़ी में किसी इक़रार का होना

महफ़ूज़ मिरे ख़्वाब को बतलाता नहीं है
इक अक्स-ए-तरद्दुद में निगह-दार का होना

हैरत में नहीं डालता अब शहर-ए-गुमाँ को
हर रोज़ लहू-रंग में अख़बार का होना

आसार-ए-तअ'ल्लुक़ को जला देता है अक्सर
गुमनाम किसी दर्द में ग़म-ख़्वार का होना

रस्ते के तकल्लुफ़ से चलो बात करें कुछ
मुमकिन नहीं हर मोड़ पे घर-बार का होना

लम्हों के इशारों से अयाँ होने लगा है
गलियों में मिरे यार की अग़्यार का होना

करता है बहुत याद शब-ओ-रोज़ मिरा दिल
फूलों के नगर में रह-ए-पुर-ख़ार का होना

अक़्लीम-ए-जफ़ा-केश में तुम देखना 'जाफ़र'
लाज़िम है पस-ए-दर किसी दीवार का होना