उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHak dohrae dastan koi

ख़ाक दोहराए दास्ताँ कोई

خاک دہرائے داستاں کوئی

शायर: Bal Krishn5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ाक दोहराए दास्ताँ कोई
बात सुनता है कब कहाँ कोई

छोड़िए अपनी कोशिश-ए-परवाज़
हाथ आता है आसमाँ कोई

साफ़ रख अपने दिल का आईना
मिल ही जाएगा क़द्र-दाँ कोई

कब से बैठे हैं हुस्न-ओ-इश्क़ ख़मोश
बात लाज़िम है दरमियाँ कोई

ख़ाक उड़ाता हुआ न चल ज़ालिम
दिल न हो जाए बे-निशाँ कोई