उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kaha hai maine ye kab mahtab mil jae

कहा है मैं ने ये कब माहताब मिल जाए

کہا ہے میں نے یہ کب ماہتاب مل جائے

शायर: Jahangeer Nayab6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कहा है मैं ने ये कब माहताब मिल जाए
मुझे तो बस मिरी आँखों का ख़्वाब मिल जाए

मैं इस गली से यही सोच कर गुज़रता हूँ
किताब-ए-ज़ीस्त का गुम-गश्ता बाब मिल जाए

सभी गुनाह मैं हँस कर क़ुबूल कर लूँगा
फ़क़ीह-ए-शहर का तुझ को ख़िताब मिल जाए

मिले फ़क़त मिरे हिस्से की रौशनी मुझ को
तलब कहाँ है कोई आफ़्ताब मिल जाए

ब-क़द्र-ए-ज़र्फ़ ही गरचे सवाल है मेरा
अजब नहीं कि मुझे बे-हिसाब मिल जाए

मैं बहर-ए-फ़िक्र में हूँ ग़र्क़ इस लिए 'नायाब'
गुहर मुझे भी कोई ज़ेर-ए-आब मिल जाए