उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi nazuk kabhi behad kaDa hai

कभी नाज़ुक कभी बेहद कड़ा है

کبھی نازک کبھی بے حد کڑا ہے

शायर: Jafar Sahni7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी नाज़ुक कभी बेहद कड़ा है
वो 'तुग़्लक़' सामने बन कर खड़ा है

ख़राशें पड़ गई हैं आसमाँ पर
ज़मीं से आज शायद वो लड़ा है

वो अब बे-कार शय है अपने घर की
कभी अंदर कभी बाहर पड़ा है

ज़माना साथ था बादल में उस के
चमकती धूप में तन्हा खड़ा है

ख़िज़ाँ का रंग है कैसा सुहाना
न पत्ता पेड़ से कोई झड़ा है

बहुत इल्ज़ाम की बारिश हुई थी
न ठहरी बूँद वो चिकना घड़ा है

मुक़द्दर ख़्वाब साए का है चमका
मिरे क़द से भी 'जाफ़र' वो बड़ा है