उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jise hum kah saken apna koi aisa nahin milta

जिसे हम कह सकें अपना कोई ऐसा नहीं मिलता

جسے ہم کہہ سکیں اپنا کوئی ایسا نہیں ملتا

शायर: Aadil Rahi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिसे हम कह सकें अपना कोई ऐसा नहीं मिलता
तिरे हमनाम मिलते हैं कोई तुझ सा नहीं मिलता

मोहब्बत के सफ़र में हैं मुसाफ़िर हम मुसाफ़िर तुम
हमें मंज़िल नहीं मिलती तुम्हें रस्ता नहीं मिलता

किसी की रुख़्सती के बाद तन्हाई के आलम में
ग़मों का साथ होता है कोई तन्हा नहीं मिलता

समझ लेना कोई मक़्सद है उस की चापलूसी में
झुका कर सर कोई इख़्लास से इतना नहीं मिलता

जिधर देखो उधर सच बोलने वाले ही मिलते हैं
तअज्जुब है कोई इस दौर में झूटा नहीं मिलता

तलब है रौशनी की तो जलाओ ख़ुद दिया 'राही'
बुझाने तिश्नगी प्यासे की तो दरिया नहीं मिलता