उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gulab rangon ko zafrani nahin karunga

गुलाब रंगों को ज़ा'फ़रानी नहीं करूँगा

گلاب رنگوں کو زعفرانی نہیں کروں گا

शायर: Aadil Rahi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुलाब रंगों को ज़ा'फ़रानी नहीं करूँगा
मैं ऐसे पौदों की बाग़बानी नहीं करूँगा

किसी की ख़ातिर ग़लत-बयानी नहीं करूँगा
मैं झूटे लोगों की तर्जुमानी नहीं करूँगा

सुना है अब वो ख़िलाफ़ मेरे गवाही देगा
जो कह रहा था कि बद-गुमानी नहीं करूँगा

सज़ा मैं ख़ुद को कभी न दूँगा तिरे किए की
जिगर को छलनी लहू को पानी नहीं करूँगा

तुम्हारे ग़म का तुम्हारी यादों का मैं अमीं हूँ
कहा था तुम से कि बे-इमानी नहीं करूँगा

मु'आफ़ तुझ को मैं पहले भी कर चुका हूँ लेकिन
दुबारा तुझ पर ये मेहरबानी नहीं करूँगा

ये ग़ैर-मुमकिन है फिर भी हाकिम बना तो 'आदिल'
सितम-रसीदों पे हुक्मरानी नहीं करूँगा